भगवान की मंगलमयी कथा के श्रवण का एकमात्र फल यही है कि उनके चरणों में परम अनुराग उत्पन्न हो ।

 एक बार शुद्ध मन से भगवान् के पास अवश्य जाओ। देखो, कितनी अनन्त शांति प्राप्त होती है। जितनी देर आपका चित्त भगवान् में लगा रहेगा उतनी देर सांसारिक बाधाएं आपकी ओर आँख भी नहीं उठा सकतीमंगलमय भगवान् के पादपंकजों में मानस-मलिन्द के पहुँच जाने के बाद सांसारिक दुःख याद करने पर भी स्मृति-पथ में भी नहीं आते। भगवान की मंगलमयी कथा के श्रवण का एकमात्र फल यही है कि उनके चरणों में परम अनुराग उत्पन्न हो । यदि ऐसा न हुआ तो कहना पड़ेगा कि कथा-श्रवण का कोई फल नहीं हुआ। इस सबमें भावना की ही प्रधानता है। भावना ऊँची होने पर भगवच्चरणकमलों में अनुराग के लिए अध्यवसाय के लिए विषयों से विरक्ति भी करनी होगी, क्योंकि विषयों में अनुराग से उसी में संग या आसक्ति होती है'ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।' अतः विषयों से आसक्ति हटाने की आवश्यकता है। जितनी-जितनी आसक्ति कम होती जायेगी उतनी-उतनी