सारे विश्व में वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, गाणपत्य संप्रदाय देखने में आते हैं। इनमें शैव अधिक हैं, क्योंकि पंच देवों में शिव, शक्ति, गणेश- ये तीन तो भगवान शिव के परिवार में से ही हैं। शिव पुराण के अनुसार भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी देवाधिदेव शिव के रूप हैं।
पुराणकारों के अनुसार संसार में सर्वाधिक भक्त भगवान शिव के ही हैं; क्योंकि असुर भी शिवजी की उपासना करते हैं। यहां तक कि भूत-प्रेतादि भी शिवजी के परिवार माने जाते हैं अर्थात् शिवजी की उपासना में सभी का स्थान है। क्यों न हो! भगवान शिव कल्याणकारी जो ठहरे! यह चराचर-स्थावर-जंगम जगत जो भी देखने में आता है, वह सारा शिव का ही रूप है-
‘अन्तस्तमो बहि:सत्त्वस्त्रिजगत्पालको हरि:।अन्त:सत्त्वस्तमोबाह्यस्त्रिजगल्लयकृद्धर:।।अन्तर्बहीरजश्चैव त्रिजगत्सृष्टिकृद्विधि:। एवं गुणास्त्रिदेवेषु गुणभिन्न: शिव: स्मृत:।।’
अर्थात् तीनों लोकों का पालन करने वाले भगवान हरि भीतर से तमोगुणी हैं और बाहर से सतोगुणी। भगवान ब्रह्मदेव, जो तीनों लोकों को उत्पन्न करते हैं, भीतर और बाहर उभय रूप में रजोगुणी हैं और भगवान परब्रह्म शिव तीनों गुणों से परे हैं। इसका रहस्य यह है कि सुख का रूप सतोगुण है, दुख का रूप तमोगुण और क्रिया का रूप रजोगुण है। भगवान विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं, इसलिए देखने में तो सृष्टि सुखरूप प्रतीत होती है, परंतु भीतर से अर्थात् वास्तव में दुखरूप होने से विष्णु भगवान का कार्य बाहर से सतोगुणी होने पर भी तत्त्वत: तमोगुणी ही है। इसलिए भगवान विष्णु के वस्त्राभूषण सुंदर और सात्विक होने पर भी श्यामवर्ण हैं।
भगवान शिव सृष्टि का संहार करते हैं। वे देखने में तो दुखरूप हैं, पर वास्तव में संसार को मिटा कर परमात्मा में एकीभाव कराना उनका सुखरूप है। इसीलिए भगवान शिव का बाहरी शृंगार तमोगुणी होने पर भी स्वरूप सतोगुणी है और उनका शीघ्र प्रसन्न होना भी, जिसके कारण वे आशुतोष कहलाते हैं, सतोगुण का ही स्वभाव है।