वर्तमान समय में त्याग, तपस्या और बैराग्य का लगभग लोप सा हो गया है। भेष और उपदेश में इनकी चर्चा हो रही है, लेकिन उपदेश देने वाले के आचरण में त्याग ,बैराग नहीं बल्कि ढोंग एवं पाखण्ड ज्यादा है।
मन की गति बड़ी चंचल है। यह किसी भी तरह काबू में नहीं आता है। सत्संग में,श्मशान में कुछ काल के लिए मन में उपजा हुआ बैराग्य भी वहां से हटते ही पुन: मोहग्रस्त हो जाता है। जन्म जन्म के अभ्यास के बावजूद कुसंग का एक पल भी त्याग और बैराग्य के रास्ते से भटका कर जीव को माया के चक्कर में फंसा देता है। जीव अपने बल अर्थात् जप, तप, योग, समाधि के द्वारा माया से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता। जब पूर्ण रुपेण भगवान की शरणागति को जीव स्वीकार कर लेगा। तब बिना किसी अन्य साधन के ही माया से उसकी निवृत्ति हो जाएगी। अत: केवल और केवल अनन्य शरणागति ही जीव का कल्याण कर सकती है। शास्त्रों में गज ग्राह, द्रोपदी इत्यादि की कथा शरणागति की महिमा के प्रमाण हैं।